Sunday, 23 July 2017

दुनिया को नई नज़र से देखो, प्यारेलाल

"भगवान नही है चलो मान भी लिया जाये और ये भी मान लिया जाये की सृष्टि की रचना अपने आप हो गयी तो हर चीज का जोड़ा कैसे बना? पशु-पक्षी बने और उनके भी जोड़े बने फिर नस्ल आगे बढ़ने के लिये भी इंतेज़ाम हो गया? पेड़ पौधे चन्द सूरज और तारे सब के सब अपने आप बन गये और अपनाकाम भी बखूबी कर रहे हैं? वैज्ञानिको की मशीने खराब हो जाती है लेकिन ये बिना रुके अपना काम करते जा रहे हैं? सबमेबड़ा सवाल सृष्टि की रचना अपनेआप हुई को पहले नर बना या नारी अगर एक बना तो दूसरी की उत्पत्ती संभव नही? पहले मुर्गी आई या मुर्गा? दोनो के बिना अंडे की उत्पत्ती संभव नही?" on सुनो पीके

कोई मित्र हैं जिन्होंने पहले फ़ेसबुक पर फिर इस ब्लॉग पर यह सवाल पूछा है। इस सवाल में नया कुछ भी नहीं है, बचपन से सुनता आ रहा हूं, आस्तिकों/अनामों के पास वही घिसे-पिटे सवाल हैं, पर चलो मैं उत्तर नया दे देता हूं।

प्यारे दोस्त, दो-तीन बातें आपको ठीक से समझ लेनी चाहिएं वरना बार-बार लोगों को परेशान करते रहेंगे। पहली बात, अगर आपको सड़क पर कोई पायजामा गिरा हुआ मिलता है और लाख ढूंढने पर उसका मालिक़ नहीं मिलता तो क्या आप यह समझ लेते हैं कि यह पायजामा भगवान का है या इसे भगवान फेंक गया है ? जिस चीज़ का कोई कर्त्ता या मालिक़ नहीं उसके लिए आप एक काल्पनिक मालिक़ न सिर्फ़ अपने लिए ढूंढ लेते हैं बल्कि दूसरों पर भी थोपने लगते हैं ? यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी फ़िल्म का सारा प्रचार किसी एक आयटम नंबर के आधार पर किया जाए और जब देखने जाओ तो वह आयटम ही उस फ़िल्म में सिरे से ग़ायब हो ! भगवान को आपने ऐसा ही आयटम नंबर बना रखा है, दोस्त! उस काल्पनिक शख़्सियत से बिना उसकी मर्ज़ी पूछे बस अपने मतलब या डरों की वजह से आप उसे नचाए जा रहे हैं।

दूसरी बात, आप कहते हैं कि भगवान नहीं है तो जोड़े कैसे बने, नस्ल कैसे बढ़ी, मुर्गी और अंडा कैसे आया ? प्यारेलाल, आपको लगता है मालूम नहीं कि इस दुनिया में बहुत-से लोग बिना जोड़े के भी रहते हैं। जिनके जोड़े बन गए हैं उनमें से भी कईयों की आपस में पटती नहीं है, कईयों के पति या पत्नी उन्हें बीच सफ़र में अकेला फंसाकर ख़ुद दुनिया से निकल लेते हैं। जोड़ा बना है तो पूरा तो चलना चाहिए न प्यारेलाल ? दुकानदार तो फिर भी अपने सामान की साल-छै महीने की गारंटी/वारंटी लेते हैं और उसे निभाते भी हैं मगर आपका भगवान! इसके प्रोडक्ट का तो छै दिन का भरोसा नहीं। सबसे घटिया उत्पाद लगता हैं यहीं पैदा होते हैं। और प्यारेलाल, अगर जोड़े आपके भगवान ने बनाए हैं तो लड़के-लड़कियों को ये सही वक़्त पर क्यों नहीं मिलते ? उनके मां-बापों-रिश्तेदारों को क्यों दस-दस साल चप्पल घिसने पड़ते हैं ? भगवान के बनाए जोड़ों के बावजूद उनकी दहेज मांगने की हिम्मत कैसे पड़ जाती है ? मुझे तो लगता है कि इन्हीं दहेजखोरों और बेईमानों ने अपने मतलब के लिए भगवान को पैदा कर लिया है। आपको तो लगता है पूरा मालूम नहीं है कि आजकल सभी लड़के-लड़कियां दो-दो के जोड़ों में नहीं रहते, कहीं-कहीं दो-तीन लड़के, एक लड़की या दो-चार लड़कियां, एक-दो लड़के भी मिलजुलकर रहते हैं। आजकल भारत में भी बहुत-से बच्चे प्रेमविवाह कर रहे हैं जबकि पहले वे शादी के लिए अकसर रिश्तेदारों पर निर्भर रहते थे। अब आप ही सोचो कि यह वाला सिस्टम भगवान ने बनाया है या पिछलावाला ? जब समझ में आ जाए तो बता देना। आगे बात कर लेंगे। और एक बात बताऊं, दुनिया में सिर्फ़ शादियां नहीं होतीं, बलात्कार और छेड़खानियां भी होतीं हैं, गर्भ में लड़कियों की हत्या भी होती है ; कहोकि वो भी भगवान ने बनाया है, कहो ना।

और, प्यारेलाल, आदमी की मशीन और भगवान के पहाड़ों की तुलना बिलकुल बेमतलब है। आदमी कैसा भी काम करे, उसे करते हुए वह सौ प्रतिशत, बिलकुल प्रामाणिक रुप से दिखाई देता है। भगवान को आपने कब बारिश करते या सुनामी लाते हुए देखा ? क़िताबें बहुत-सी पढ़ीं होंगी आपने, कभी कोई चिंतन वग़ैरह भी किया है ? कैसी उल्टी-सीधी तुलना करते रहते हो ?

ये अंडा-मुर्गी बेमतलब की बातें हैं, प्यारेलाल! नस्ल आगे बढ़ने से क्या होता है ? मेरी जानकारी में कई लोग जवानी में ही मर गए, कई पेट में ही मर गए, तो ये दुनिया रुक गई क्या ? इत्ते बड़े-बड़े डायनासोर मर गए तो क्या बिगड़ गया ? नस्ल तो ऊंट और चूहे की भी चल रही है, आपको उनसे कितने दिन काम पड़ता है ? कॉक्रोच की नस्ल से आपको कुछ फ़ायदा होता होगा, मुझे तो उनका न होना ही अच्छा लगता है। मुर्गी और अंडा नहीं होगा तो लोग कुछ और खा/पाल लेंगे। आपने देखा नहीं लोगों को, क्या-क्या खा जाते हैं!

और मेरे प्यारे, आखि़र में सबसे मज़ेदार और सबसे नई बात बताऊं, यह दुनिया किसीने बनाई नहीं है, यह अपनेआप बनी है ? अगर आपको लगता है कि यह किसी भगवान ने बनाई है तो साबित करके दिखाओ-

-संजय ग्रोवर

23-07-2017



Thursday, 13 July 2017

भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-3

भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-2

मुझे इस बात पर न तो कोई गर्व है न शर्म कि आर एस एस एस से मेरा कभी कोई किसी भी तरह का संबंध नहीं रहा। और मेरे लिए यह बात भी किसी झटके की तरह नहीं है कि कभी मेरे प्रिय रहे ऐंकर/न्यूज़रीडर विनोद दुआ का बचपन में शाखाओं में न सिर्फ़ आना-जाना रहा बल्कि उन्होंने आर एस एस एस के संस्कारों की तारीफ़ भी की है (4ः18 पर देखिए)।



अन्य संदर्भों में मुझे विनोद दुआ साहब के दो और वीडियो भी उल्लेखनीय लगे जिनका ज़िक्र आगे कभी करुंगा।

-संजय ग्रोवर
13-07-2017

भीड़ और भगवान-1

एक प्रसिद्ध व्यक्ति ट्वीट करता है कि एक सरकारी संस्था ने मुझसे पांच लाख रुपए रिश्वत मांगी है।

कोई पत्रकार उससे नहीं पूछता कि यह रिश्वत किस वजह से मांगी गई है !? वह रिश्वत मांगनेवाले का नाम नहीं बताता। 

वही टीवी चैनल बताते हैं कि यह व्यक्ति ख़ुद भी रेज़ीडेंशियल इलाक़े में कमर्शियल दफ़्तर बनाने के इरादे से अवैद्य निर्माण करवा रहा था। थोड़े दिन चैनलों पर समाचार चलता है, छोटी-मोटी बहसें चलतीं हैं, नतीज़तन वह आदमी और ज़्यादा मशहूर हो जाता है।  

जनता और बुद्धिजीवियों में से कोई नहीं पूछता कि आपने नाम नहीं बताया, आपके अपने अवैद्य निर्माण की हक़ीक़त क्या है ?

उस प्रसिद्ध आदमी के टीवी कार्यक्रम में आए दिन उस ट्वीट की चर्चा उपलब्धि की तरह होती है। भीड़ हंसती है, तालियां बजाती है।

इस भीड़ से किसीको कोई शिक़ायत नहीं है।

अतार्किक मानसिकता अतार्किक भीड़ का निर्माण करती है। अतार्किक भीड़ अतार्किक महापुरुष और सेलेब्रिटी बनाती है।

भीड़ हमारे लिए तालियां बजाती है, हमारे घर के नीचे खड़े होकर हाथ हिलाती है, हमारे ऑटोग्राफ़ लेती है, हमें माला पहनाती है, हमारा सम्मान करती है......

जब तक यह सब होता है, भीड़ हमें महान लगती है, हम नहीं पूछते, नहीं सोचते कि यह सब ठीक है या ग़लत, इससे समाज या दूसरे व्यक्तियों का फ़ायदा होगा या नुकसान.....

इस भीड़ को अंततः झेलता कौन है ?

मेरे आसपास जब भी कोई अवैद्य निर्माण होता है और मैं उसे रुकवाने की कोशिश करता हूं तो मुझे हमेशा यही 
तर्क मिलता है कि सब यही कर रहे हैं तो फिर तुम अकेले कैसे सही हो ?

मेरा मन होता है, संभवतः एक बार मैंने कहा भी कि अगर सब बलात्कार करने लगें तो क्या मैं भी शुरु कर दूं !? कलको सब छेड़खानी करने तुम्हारे घर आएंगे तो तुम चाय-पेप्सी के साथ ख़ुद भी उनमें शामिल हो जाओंगे ?

अवैद्य निर्माणकर्ताओं की यह बात तो सही ही होती है कि ‘सब यही कर रहे हैं’। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, साहित्यकार, पत्रकार, बंगाली, मद्रासी, पंजाबी, गुजराती, आस्तिक, नास्तिक, ब्राहमण, दलित, मार्क्सवादी, राष्ट्रवादी.........कौन है जो यह नहीं करता ?

हममें से किसने इस भीड़ पर ऐतराज़ किया ?

भीड़ हमें भगवान बनाती है और हम ही उसे इसके लिए तैयार करते हैं। अगर कोई भीड़ की ज़्यादा परवाह नहीं करता तो ‘महापुरुष’ तक उसे घमंडी, सनकी, पागल तक करार देने लगते हैं।  

जिस वक़्त भीड़ के खि़लाफ़ एक भीड़ विरोध करने खड़ी होती है ठीक उसी वक़्त दो फ़िल्मी सितारों के घरों के नीचे ‘युवाओं’ की भीड़ हाथ हिलाने और उनके दर्शन के लिए इंतज़ार कर रही होती है।

क्या हमने कभी इस भीड़ के बारे में सोचा ? क्या यह भीड़ बहुत सोच-समझकर आती है ? क्या ये बहुत तार्किक लोग हैं ? हममें से कई लोग इसपर सोचने तक को तैयार नहीं हैं, वजह बड़ी साफ़ है कि उन्हें भी इसी तरह लोकप्रिय होना है, महापुरुष, सेलेब्रिटी, आयकन और आयडल बनना है।

किसी दिन यह भीड़ हमें छोड़कर किसी और के पास चली जाती है, नतीज़तन कोई लोकप्रिय स्टार शराब में डूब जाता है, कोई आयकन प्रसिद्धि वापिस पाने के लिए अजीबोग़रीब हरक़तें शुरु कर देता है.......

इससे भी बुरी स्थिति तब होती है जब हमारी ही बनाई भीड़ हमारे खि़लाफ़ होने लगती है। और भी ख़राब तब यह होता है कि हम ख़ुद कुछ समझने के बजाय दूसरों को समझाना शुरु कर देते हैं......

(जारी)

-संजय ग्रोवर
13-07-2017

Tuesday, 4 July 2017

मेरे साथ कौन जाएगा ?

04-07-2017

मेरे पीछे का फ़्लैट(134-ए, पॉकेट-ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली) जो कई सालों से खाली पड़ा था, कुछ दिन पहले बिक गया है। कई दिनों से वहां से खटर-पटर, धूम-धड़ाम की आवाज़ें आ रहीं हैं। आज मैंने पिछले कई साल से बंद पड़ा अपने पिछले कोर्टयार्ड का दरवाज़ा खोला जो गंदगी से भरा मिल़ा। इस गंदगी में मेरा योगदान ज़रा भी नहीं है। ऊपर मजदूर काम करते दिखाई दिए, मैंने कहा यहां कमरा तो नहीं बना रहे? उन्होंने कहा कि बना तो रहे हैं। मैंने कहा कि यह नहीं हो सकता, यह ग़ैरक़ानूनी है, मैंने यह डीडीए फ़्लैट इसलिए ख़रीदा था कि आगे-पीछे ख़ुला था, मैं इसे बंद नहीं होने दूंगा। मजदूर बोले कि मालिक़ से बात करलो, मैंने कहा इसमें बात क्या करनी है, क़ानून स्पष्ट है। उन्होंने मालिक़ को फ़ोन मिलाकर मुझे पकड़ा दिया। मालिक़ कहने लगे कि मिल-बैठकर बात कर लेंगे। मैंने कहा इसमें बात क्या करनी है, पैसे मैंने लेने नहीं हैं, क़ानून मुझे तोड़ना नहीं है। फिर वे बोले कि चार-चार बच्चे हैं, जगह तो चाहिए। मैंने कहा कि इसमें मेरा कुछ भी लेना-देना नहीं है, मेरी कोई ग़लती नहीं है, मैं क्यों भुगतूं ? काफ़ी बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि आपकी मर्ज़ी नहीं होगी तो नहीं बनाएंगे मगर साथ-साथ एक बार मिलने की बात भी कहे जा रहे थे। 
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यह स्टेटस मैंने किसी मदद के लिए नहीं बल्कि सूचनार्थ लिखा है। आज से कुछ चार-पांच साल पहले जब मैं चारों तरफ़ से घिरा हुआ था, कई तरह के प्रयत्न और तजुर्बे कर चुका था, उसी एक घड़ी में मैंने एक निर्णय ले लिया था-रोज़-रोज़ मरने से अच्छा है, एक ही दिन मर जाओ। वो दिन है और आज का दिन है मैंने किसीको मदद के लिए नहीं पुकारा। बड़ी से बड़ी परेशानी में एक ही चीज़ मुझे सहारा देती है-कि ज़्यादा से ज़्यादा कोई जान ले लेगा मगर मैं किसी ग़लत आदमी के दबाव में नहीं आऊंगा, मैं पाखंडियों को हीरो नहीं बनने दूंगा, मैं बेईमानों को सम्मान के साथ नहीं सुनूंगा, मैं कट्टरपंथियों से प्रगतिशीलता नहीं सीखूंगा, मैं वर्ण और श्रेष्ठतावादियों से समानता नहीं सीखूंगा, मैं मानवताविरोधी, वर्णसमर्थक पुरुषों/स्त्रियों से स्त्रीवाद नहीं सीखूंगा। तब तो बिलकुल भी नहीं जब मैं इनको भी अच्छी तरह जानता होऊं और ख़ुदको भी...... 

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आज या आगे कभी भी, मुझे कुछ होता है तो मुझे कोई अफ़सोस नहीं होगा। पिछले 5-7 सालों में, मैंने अपनी पसंद की ज़िंदगी जी है, अपनी पसंद का लेखन किया है, अपनी तरह से क़िताबें छापीं हैं। कई-कई तरह के भयानक दर्दों के बीच खाना बनाना, कपड़े धोना, बर्तन धोना, वीडियो बनाना, ई-क़िताब छापना, बेईमानों से निपटना....सब कुछ अपने आप सीखा। अगर ज़िंदा रहा तो बचे हुए काम भी साल-दो-साल में पूरे हो जाएंगे।


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अगर मुझे कुछ होता है तो इसके ज़िम्मेदार होंगे-धार्मिकता, धर्मनिरपेक्षता और ब्राहमणवाद क्योंकि ये सब ही इंसान को सिखाते हैं कि पहले नाजायज़ काम कर लो, बेईमानी और बलात्कार कर लो और बाद में डुबकी लगालो, चढ़ावा चढ़ा दो, भंडारा करा दो, कीर्तन-जागरन करा दो, पुरस्कार बांट दो और आराम से सो जाओ।
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इसे विस्तार से अभी लिखना है। अभी तो सबसे ओपन नेटवर्क चलानेवालों के बारे में भी लिखना है कि वे पिछले कई सालों से बीच-बीच में क्या-क्या अजीब हरक़तें मेरे साथ करते रहते हैं। 

न तो मैं किसीका कोई काम पिछले रास्ते से या जुगाड़ से करा सकता हूं, न ही मैं किसी विचारधारा पर ज़बरदस्ती हामी भर सकता हूं, न ही किसी जाति-बिरादरी-धर्म-गुट-दल में शामिल हो सकता हूं, न किसीकी समीक्षा कर या करा सकता हूं, न किसीको अख़बार, सेमिनार या चैनल में जगह दिला सकता हूं, न किसीको नौकरी दिला सकता हूं, न समाज के मानवविरोधी कर्मकांडों, रीति-रिवाजों में शामिल हो सकता हूं....इसके बावजूद भी कोई अगर बात करना चाहे तो कर सकता है.... 


5-7 साल पहले जब ऐसी परेशानी आई थी तो कुछ दोस्त मदद के लिए आए थे, उनमें से एक-दो ने काफ़ी काम भी किया। बाद में मैंने उन्हें भी मुक्त कर दिया....


05-07-2017


मैं यह बताना चाहता हूं कि लोग ख़ुलें में सिर्फ़ टट्टी नहीं करते, बल्कि और भी बहुत बड़े-बड़े काम करते हैं। और इन कामों में अकसर महिलाओं की भी पूरी सहमति रहती है। मुझे याद है पिछली बार जब मैंने ऐसे ही नाजायज़ कमरा बनानेवालों को रोका था और उन लोगों ने मुझे दाएं-बाएं, दोनों तरफ़ से पकड़ा हुआ था तो एक महिला मुंह पर चुन्नी डाले हंस रही थी। कल को इस औरत के साथ कुछ होगा तो क्या मेरे लिए इसकी मदद करना आसान होगा ?


पिछली बार ही फ़ेसबुक पर किन्हीं सज्जन ने सुझाव दिया था कि अपने पड़ोसियों को लेकर थाने जाओ। मैंने सोचा आधे पड़ोसियों ने ऐसे कमरे बना रखे हैं और कईयों ने बनाने हैं, मेरे साथ कौन जाएगा ?


बाद में यही हुआ भी, मेरे आसपास के कई घरों में कई कमरे और बन गए।


मेरा शक़ एक दिन यक़ीन में न बदल जाए कि धर्म और भगवान और कुछ नहीं सिर्फ़ बेईमानों का सुनियोजित गठजोड़ है, माफ़िया है  !! 


यह कमरा बनता है कि नहीं बनता, यह कुछ समय में सामने आ जाएगा मुझे ये बातें वैसे भी उठानी ही थी, आज ही सही।






(गाने भी मज़ेदार हैं-पहली पंक्ति में कहा है, ‘इंसाफ़ की डगर पे बच्चों दिखाओ चलके...’..अगली पंक्ति है-‘दुनिया के रंज सहना, और कुछ न मुंह से कहना...फिर अगली पंक्तिओं में कहा है-‘अपने हों या पराए, सबके लिए हो न्याय.....
गाया भी अच्छा है..... )

-संजय ग्रोवर
05-07-2017