Saturday, 7 October 2017

आपकी छोटी बच्ची ने सुझाया....

जब आपको मरीज़ की जान की चिंता होती है तो आपको इसकी परवाह नहीं होती कि वह होमियोपैथी से ठीक होगा, ऐलोपैथी से होगा कि आयुर्वेद से होगा कि और किसी तरीके से होगा। आप यथासंभव कोशिश करते हैं, जितना जेब अलाउ करती है, पैसा ख़र्च करते हैं, कर्ज़ भी ले लेते हैं, भाग-दौड़ करते हैं। मरीज़ बच जाए तब ज़रुर आप लोगों को बताते हैं कि बचाने का श्रेय किसे जाता है।

दवा कंपनी या डॉक्टर इसपर गर्व करे, इसकी पब्लिसिटी करे तो समझ में आता है। क्योंकि उनका यह धंधा है। मरीज़ मेरी दवा से बचे कि तेरी दवा से, इससे हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है!?

मगर सामाजिक समस्याओं के मामले में हमारा रवैय्या अजीब है। समस्या हल भी नहीं हुई कि लोग क्रेडिट लेने को तैयार बैठे हैं। कोई पंद्रह हज़ार साल पुरानी क़िताब लिए चला आ रहा है कि देखो, यहीं सारे सवालों के जवाब लिखे हैं तो कोई पंद्रह सौ साल पुराना पोथन्ना लिए खड़ा है कि इससे हल न हुआ तो फिर किसीसे न होगा। कोई कह रहा है कि हमारी तरक़ीब तो तुमने कभी आज़माई नहीं, एक बार इसे भी ट्राई करके देखो न ! यह तरकीब कहां से आई! यह भी एक क़िताब से आई जो किसी समाज की किसी बदमाशी की वजह से कहीं दब-ढंक गई थी। अरे, मतलब तो समस्या हल होने से है, सबको अपना बैनर लगाने की इतनी चिंता क्यों लगी है !?

यह मसला सिर्फ़ अहंकार का है। वरना मैं बिना किसी शोध, बिना सर्वे के दावा कर सकता हूं कि दुनिया में कोई धर्म, कोई वाद, कोई देश, कोई समूह, कोई व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जो सब कुछ जानता हो, जिसके पास सारी समस्याओं के हल हों। इससे ज़्यादा मूर्खतापूर्ण सोच कोई हो नहीं सकती। अगर कोई ऐसा दावा करता है तो समझिए कि वह ख़ुद ही एक समस्या है।

मान लीजिए स्त्रियों की कोई समस्या है, तो पहले तो हम यहीं लड़ने-मरने में वक्त लगा रहे हैं कि मेरा फ़ॉर्मूला अप्लाई होगा, नहीं मेरा बैटर है, नहीं हमारा बैस्ट है। अरे समस्या जिससे हल हो रही हो उसे अपना लो। वह तरीक़ा चाहे पश्चिम से आया हो, बाबा साहेब ने बताया हो, सनातन से निकला हो, इस्लाम ने दिया हो कि आपकी छोटी बच्ची ने सुझाया हो। जिसका जितना सही है उतना ले लो। मतलब तो समस्या हल होने से है।

मुझे तो लगता है कि मीडिया द्वारा किसीको भी सार्वजनिक तौर पर क्रेडिट दिया जाना बंद कर दिया जाना चाहिए। इससे एक तो क्रेडिट के झगड़े भी बंद हो जाएंगे, दूसरे यह भी पता चल जाएगा कि सचमुच निस्वार्थ समाजसेवा में कितने लोगों की रुचि है।

-संजयग्रोवर

07-10-2013
(on facebook)

Friday, 11 August 2017

गांधीजी को पहननेवाले

भारत में बच्चों की ख़पत कितनी और कैसी है यह तो ठीक-ठीक मालूम नहीं मगर उत्पादन भरपूर मात्रा में होता है। हलचल और हरक़तें भी इतनी और ऐसी है कि कई बार लगता है यहां सिर्फ़ बच्चे ही बच्चे हैं। बच्चों की उम्र कितनी भी हो पर वे अकसर कहते पाए जाते हैं- ‘माई पापा इज़ द बेस्ट’, माई मम्मी इज़ बेस्ट मम्मी ऑफ़ वर्ल्ड’, माई दीदी इज़ बैस्ट दीदी’, ‘माई अंकल.....। यही बच्चे जब कहते हैं कि ‘गांधीजी बहुत महान व्यक्ति थे’ तो मैं सोचता हूं कि गांधीजी बेचारे कुछ भी रहे हों पर बैस्ट तो तुम्हारे पापा हैं। अगर तुम्हारे घर-परिवार के लोगों ने ही बैस्ट रहना है तो गांधीजी और लिंकन जी को तो दूसरे-तीसरे स्थान के लिए ही संघर्ष करना होगा। ख़ैर, कोई परेशानी की बात नहीं है, ऐसी विरोधाभासी दलीलों से मुझे आए दिन गुज़रना होता है। कई साल पहले किसी अख़बार की उल्टे पन्ने पर छपी किसी ख़बर में पढ़ा था कि भारत में हर तीसरा आदमी सीज़ोफ्रीनिक है। तबसे ही मैं तीसरा और पहला के बीच फ़र्क पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं।

भारत के लोग गांधीजी का बहुत आदर करते हैं, ऐसा मैंने सुना भी है और पढ़ा भी है। देखा आपने होगा। मैंने तो अभी-अभी देखा कि उपराष्ट्रपति के आदरणीय चुनाव में गांधीजी के पोते श्री गोपाल कृष्ण गांधी को हारने के लिए खड़ा किया गया। उससे पहले एक बार श्री राजमोहन गांधी अमेठी से खड़े हुए थे और हार गए थे। ऐसा लगता है कि गांधीजी से ऐसा कोई अनुबंध हुआ था कि जब भी हारने के लिए कोई आदमी चाहिए होगा तो आपके परिवार से काम ले लिया जाएगा। इस तरह देश भी आपको याद रखेगा भले हारने से ही याद रखे। वैसे भी गांधीजी का लड़का या पोता होना चुनाव लड़ने के लिए कोई योग्यता तो है नहीं, बल्कि यह तो सीधे-सीधे वंशवाद ही लगता है। इसमें नयी बात यही है कि वंशवाद का इस्तेमाल हारने के लिए (शायद) पहली बार किया जा रहा है।
(साभार)

मैं गांधीजी से सीधे-सीधे कभी मिला नहीं इसलिए नहीं कह सकता कि उन्होंने लंगोटी पहनना कब शुरु किया था, किया था कि नहीं किया था, परंतु यह पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि गांधीजी के किसी चाहनेवाले को मैंने लंगोटी पहनते नहीं देखा। मैं सोचता हूं कि यह बहुत प्रैक्टीकल साबित हो सकता है कि गांधीजी के सभी प्रशंसक साल में कम से कम कुछ दिन लंगोटी पहनें, इससे उनके फ़ालतू कपड़े ग़रीबों में बांटे जा सकेंगे। कोशिश करके देखना चाहिए क्योंकि ‘कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती है’। पर क्या ये लोग लंगोटी पहन पाएंगे, ये तो सर से पांव तक पूरे के पूरे गांधीजी को ही पहने बैठे हैं। शक़ होता है कि ये कोशिश ही तभी शुरु करते हैं जब जीत निश्चित हो या निश्चित कर ली गई हो। जब आपने पूरे के पूरे गांधीजी को ही महज़ प्रतीक में बदल दिया हो तो आपमें और उनमें, प्रतीक के तौर पर ही सही, कुछ तो समानता या सामंजस्य दिखना चाहिए। 

( 4:20 से देखें )
पिछले सालों में भारत में आज़ादी के जो फ़ोटोकॉपी आंदोलन हुए उनसे मुझे गांधीजी के वादीजीयों को समझने में मदद मिली। दो-तीन साल तक तो मसीहा क़िस्म के पत्रकार/एंकर भी इन्हें स्वत-स्फ़ूर्त आंदोलन बताते रहे। आदरणीय विनोद दुआ ने तो अभी पांच-छै साल बाद बताया कि यह आंदोलन मीडिया का बनाया हुआ था। सारे चैनलों पर एक जैसे भजननुमां ग़ज़लें पहले दिन से ही बज रहे थे, सारी टोपियां नई-नकोर थीं और एक ही दुकान से आई लगतीं थीं। मैं काफ़ी दिन तक चिंतनरत रहा कि महापुरुष पैदा होते हैं, बनाए जाते हैं या बनवाए जाते हैं ! 

कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक सदस्य गोडसे ने गांधीजी की हत्या गोली मारकर की। गांधीजी उस वक़्त प्रार्थना करके लौट रहे थे। प्रार्थना में सुनते हैं संघ का भी काफ़ी विश्वास है। वैसे गांधीजी का और संघ का झगड़ा जो भी रहा हो पर इनमें समानताएं भी कई रहीं हैं। जैसा कि मैंने पढ़ा है 
गांधीजी भी वर्णव्यवस्था को मानते थे और संघ भी। गांधीजी गीता पढ़ते थे और संघ तो सुना है गोरखपुर में बेचता भी है। गांधीजी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी और संघ के साथी बाबा रामदेव को आप अपने पसंदीदा चैनलों पर देख ही रहे होंगे जो कह रहे हैं कि विदेशी छोड़ो पतंजलि ख़रीदो। गांधीजी भी स्वराज की बात करते थे और बात तो संघ भी करता है। गांधीजी भी धार्मिक थे और संघ भी। वैसे धार्मिक लोगों की आपस में कम ही पटती है। यहां तक कि गोडसे ने गोली मारने से पहले बाक़ायदा भारतीय संस्कृति-अनुसार गांधीजी को हाथ जोड़कर नमस्कार किया यानि कि सम्मान किया अर्थात् आदर किया तत्पश्चात् तुरंत गोली मारदी। आदर करने के सबके अपने-अपने कांसेप्ट हैं। गांधीजी का अहिंसा का जो कांसेप्ट था उससे बताते हैं कि श्री अंबेडकर के लिए काफ़ी समस्या खड़ी हो गई थी।

भारत में अकसर ज़्यादातर लोग श्री मोहनदास गांधी को ‘गांधीजी-गांधीजी’ के संबोधन से पुकारते हैं। इधर मैंने यह भी सुना है कि इस तरह से ‘जी’ का प्रयोग संघी ही ज़्यादा करते हैं।


मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूं। 


मैं कोई इतिहासकार नहीं हूं। एक सोचनेवाला व्यक्ति हूं।


-संजय ग्रोवर
11-08-2017