Friday, 11 August 2017

गांधीजी को पहननेवाले

भारत में बच्चों की ख़पत कितनी और कैसी है यह तो ठीक-ठीक मालूम नहीं मगर उत्पादन भरपूर मात्रा में होता है। हलचल और हरक़तें भी इतनी और ऐसी है कि कई बार लगता है यहां सिर्फ़ बच्चे ही बच्चे हैं। बच्चों की उम्र कितनी भी हो पर वे अकसर कहते पाए जाते हैं- ‘माई पापा इज़ द बेस्ट’, माई मम्मी इज़ बेस्ट मम्मी ऑफ़ वर्ल्ड’, माई दीदी इज़ बैस्ट दीदी’, ‘माई अंकल.....। यही बच्चे जब कहते हैं कि ‘गांधीजी बहुत महान व्यक्ति थे’ तो मैं सोचता हूं कि गांधीजी बेचारे कुछ भी रहे हों पर बैस्ट तो तुम्हारे पापा हैं। अगर तुम्हारे घर-परिवार के लोगों ने ही बैस्ट रहना है तो गांधीजी और लिंकन जी को तो दूसरे-तीसरे स्थान के लिए ही संघर्ष करना होगा। ख़ैर, कोई परेशानी की बात नहीं है, ऐसी विरोधाभासी दलीलों से मुझे आए दिन गुज़रना होता है। कई साल पहले किसी अख़बार की उल्टे पन्ने पर छपी किसी ख़बर में पढ़ा था कि भारत में हर तीसरा आदमी सीज़ोफ्रीनिक है। तबसे ही मैं तीसरा और पहला के बीच फ़र्क पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं।

भारत के लोग गांधीजी का बहुत आदर करते हैं, ऐसा मैंने सुना भी है और पढ़ा भी है। देखा आपने होगा। मैंने तो अभी-अभी देखा कि उपराष्ट्रपति के आदरणीय चुनाव में गांधीजी के पोते श्री गोपाल कृष्ण गांधी को हारने के लिए खड़ा किया गया। उससे पहले एक बार श्री राजमोहन गांधी अमेठी से खड़े हुए थे और हार गए थे। ऐसा लगता है कि गांधीजी से ऐसा कोई अनुबंध हुआ था कि जब भी हारने के लिए कोई आदमी चाहिए होगा तो आपके परिवार से काम ले लिया जाएगा। इस तरह देश भी आपको याद रखेगा भले हारने से ही याद रखे। वैसे भी गांधीजी का लड़का या पोता होना चुनाव लड़ने के लिए कोई योग्यता तो है नहीं, बल्कि यह तो सीधे-सीधे वंशवाद ही लगता है। इसमें नयी बात यही है कि वंशवाद का इस्तेमाल हारने के लिए (शायद) पहली बार किया जा रहा है।
(साभार)

मैं गांधीजी से सीधे-सीधे कभी मिला नहीं इसलिए नहीं कह सकता कि उन्होंने लंगोटी पहनना कब शुरु किया था, किया था कि नहीं किया था, परंतु यह पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि गांधीजी के किसी चाहनेवाले को मैंने लंगोटी पहनते नहीं देखा। मैं सोचता हूं कि यह बहुत प्रैक्टीकल साबित हो सकता है कि गांधीजी के सभी प्रशंसक साल में कम से कम कुछ दिन लंगोटी पहनें, इससे उनके फ़ालतू कपड़े ग़रीबों में बांटे जा सकेंगे। कोशिश करके देखना चाहिए क्योंकि ‘कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती है’। पर क्या ये लोग लंगोटी पहन पाएंगे, ये तो सर से पांव तक पूरे के पूरे गांधीजी को ही पहने बैठे हैं। शक़ होता है कि ये कोशिश ही तभी शुरु करते हैं जब जीत निश्चित हो या निश्चित कर ली गई हो। जब आपने पूरे के पूरे गांधीजी को ही महज़ प्रतीक में बदल दिया हो तो आपमें और उनमें, प्रतीक के तौर पर ही सही, कुछ तो समानता या सामंजस्य दिखना चाहिए। 

( 4:20 से देखें )
पिछले सालों में भारत में आज़ादी के जो फ़ोटोकॉपी आंदोलन हुए उनसे मुझे गांधीजी के वादीजीयों को समझने में मदद मिली। दो-तीन साल तक तो मसीहा क़िस्म के पत्रकार/एंकर भी इन्हें स्वत-स्फ़ूर्त आंदोलन बताते रहे। आदरणीय विनोद दुआ ने तो अभी पांच-छै साल बाद बताया कि यह आंदोलन मीडिया का बनाया हुआ था। सारे चैनलों पर एक जैसे भजननुमां ग़ज़लें पहले दिन से ही बज रहे थे, सारी टोपियां नई-नकोर थीं और एक ही दुकान से आई लगतीं थीं। मैं काफ़ी दिन तक चिंतनरत रहा कि महापुरुष पैदा होते हैं, बनाए जाते हैं या बनवाए जाते हैं ! 

कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक सदस्य गोडसे ने गांधीजी की हत्या गोली मारकर की। गांधीजी उस वक़्त प्रार्थना करके लौट रहे थे। प्रार्थना में सुनते हैं संघ का भी काफ़ी विश्वास है। वैसे गांधीजी का और संघ का झगड़ा जो भी रहा हो पर इनमें समानताएं भी कई रहीं हैं। जैसा कि मैंने पढ़ा है 
गांधीजी भी वर्णव्यवस्था को मानते थे और संघ भी। गांधीजी गीता पढ़ते थे और संघ तो सुना है गोरखपुर में बेचता भी है। गांधीजी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी और संघ के साथी बाबा रामदेव को आप अपने पसंदीदा चैनलों पर देख ही रहे होंगे जो कह रहे हैं कि विदेशी छोड़ो पतंजलि ख़रीदो। गांधीजी भी स्वराज की बात करते थे और बात तो संघ भी करता है। गांधीजी भी धार्मिक थे और संघ भी। वैसे धार्मिक लोगों की आपस में कम ही पटती है। यहां तक कि गोडसे ने गोली मारने से पहले बाक़ायदा भारतीय संस्कृति-अनुसार गांधीजी को हाथ जोड़कर नमस्कार किया यानि कि सम्मान किया अर्थात् आदर किया तत्पश्चात् तुरंत गोली मारदी। आदर करने के सबके अपने-अपने कांसेप्ट हैं। गांधीजी का अहिंसा का जो कांसेप्ट था उससे बताते हैं कि श्री अंबेडकर के लिए काफ़ी समस्या खड़ी हो गई थी।

भारत में अकसर ज़्यादातर लोग श्री मोहनदास गांधी को ‘गांधीजी-गांधीजी’ के संबोधन से पुकारते हैं। इधर मैंने यह भी सुना है कि इस तरह से ‘जी’ का प्रयोग संघी ही ज़्यादा करते हैं।


मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूं। 


मैं कोई इतिहासकार नहीं हूं। एक सोचनेवाला व्यक्ति हूं।


-संजय ग्रोवर
11-08-2017


Sunday, 23 July 2017

दुनिया को नई नज़र से देखो, प्यारेलाल

"भगवान नही है चलो मान भी लिया जाये और ये भी मान लिया जाये की सृष्टि की रचना अपने आप हो गयी तो हर चीज का जोड़ा कैसे बना? पशु-पक्षी बने और उनके भी जोड़े बने फिर नस्ल आगे बढ़ने के लिये भी इंतेज़ाम हो गया? पेड़ पौधे चन्द सूरज और तारे सब के सब अपने आप बन गये और अपनाकाम भी बखूबी कर रहे हैं? वैज्ञानिको की मशीने खराब हो जाती है लेकिन ये बिना रुके अपना काम करते जा रहे हैं? सबमेबड़ा सवाल सृष्टि की रचना अपनेआप हुई को पहले नर बना या नारी अगर एक बना तो दूसरी की उत्पत्ती संभव नही? पहले मुर्गी आई या मुर्गा? दोनो के बिना अंडे की उत्पत्ती संभव नही?" on सुनो पीके

कोई मित्र हैं जिन्होंने पहले फ़ेसबुक पर फिर इस ब्लॉग पर यह सवाल पूछा है। इस सवाल में नया कुछ भी नहीं है, बचपन से सुनता आ रहा हूं, आस्तिकों/अनामों के पास वही घिसे-पिटे सवाल हैं, पर चलो मैं उत्तर नया दे देता हूं।

प्यारे दोस्त, दो-तीन बातें आपको ठीक से समझ लेनी चाहिएं वरना बार-बार लोगों को परेशान करते रहेंगे। पहली बात, अगर आपको सड़क पर कोई पायजामा गिरा हुआ मिलता है और लाख ढूंढने पर उसका मालिक़ नहीं मिलता तो क्या आप यह समझ लेते हैं कि यह पायजामा भगवान का है या इसे भगवान फेंक गया है ? जिस चीज़ का कोई कर्त्ता या मालिक़ नहीं उसके लिए आप एक काल्पनिक मालिक़ न सिर्फ़ अपने लिए ढूंढ लेते हैं बल्कि दूसरों पर भी थोपने लगते हैं ? यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी फ़िल्म का सारा प्रचार किसी एक आयटम नंबर के आधार पर किया जाए और जब देखने जाओ तो वह आयटम ही उस फ़िल्म में सिरे से ग़ायब हो ! भगवान को आपने ऐसा ही आयटम नंबर बना रखा है, दोस्त! उस काल्पनिक शख़्सियत से बिना उसकी मर्ज़ी पूछे बस अपने मतलब या डरों की वजह से आप उसे नचाए जा रहे हैं।

दूसरी बात, आप कहते हैं कि भगवान नहीं है तो जोड़े कैसे बने, नस्ल कैसे बढ़ी, मुर्गी और अंडा कैसे आया ? प्यारेलाल, आपको लगता है मालूम नहीं कि इस दुनिया में बहुत-से लोग बिना जोड़े के भी रहते हैं। जिनके जोड़े बन गए हैं उनमें से भी कईयों की आपस में पटती नहीं है, कईयों के पति या पत्नी उन्हें बीच सफ़र में अकेला फंसाकर ख़ुद दुनिया से निकल लेते हैं। जोड़ा बना है तो पूरा तो चलना चाहिए न प्यारेलाल ? दुकानदार तो फिर भी अपने सामान की साल-छै महीने की गारंटी/वारंटी लेते हैं और उसे निभाते भी हैं मगर आपका भगवान! इसके प्रोडक्ट का तो छै दिन का भरोसा नहीं। सबसे घटिया उत्पाद लगता हैं यहीं पैदा होते हैं। और प्यारेलाल, अगर जोड़े आपके भगवान ने बनाए हैं तो लड़के-लड़कियों को ये सही वक़्त पर क्यों नहीं मिलते ? उनके मां-बापों-रिश्तेदारों को क्यों दस-दस साल चप्पल घिसने पड़ते हैं ? भगवान के बनाए जोड़ों के बावजूद उनकी दहेज मांगने की हिम्मत कैसे पड़ जाती है ? मुझे तो लगता है कि इन्हीं दहेजखोरों और बेईमानों ने अपने मतलब के लिए भगवान को पैदा कर लिया है। आपको तो लगता है पूरा मालूम नहीं है कि आजकल सभी लड़के-लड़कियां दो-दो के जोड़ों में नहीं रहते, कहीं-कहीं दो-तीन लड़के, एक लड़की या दो-चार लड़कियां, एक-दो लड़के भी मिलजुलकर रहते हैं। आजकल भारत में भी बहुत-से बच्चे प्रेमविवाह कर रहे हैं जबकि पहले वे शादी के लिए अकसर रिश्तेदारों पर निर्भर रहते थे। अब आप ही सोचो कि यह वाला सिस्टम भगवान ने बनाया है या पिछलावाला ? जब समझ में आ जाए तो बता देना। आगे बात कर लेंगे। और एक बात बताऊं, दुनिया में सिर्फ़ शादियां नहीं होतीं, बलात्कार और छेड़खानियां भी होतीं हैं, गर्भ में लड़कियों की हत्या भी होती है ; कहोकि वो भी भगवान ने बनाया है, कहो ना।

और, प्यारेलाल, आदमी की मशीन और भगवान के पहाड़ों की तुलना बिलकुल बेमतलब है। आदमी कैसा भी काम करे, उसे करते हुए वह सौ प्रतिशत, बिलकुल प्रामाणिक रुप से दिखाई देता है। भगवान को आपने कब बारिश करते या सुनामी लाते हुए देखा ? क़िताबें बहुत-सी पढ़ीं होंगी आपने, कभी कोई चिंतन वग़ैरह भी किया है ? कैसी उल्टी-सीधी तुलना करते रहते हो ?

ये अंडा-मुर्गी बेमतलब की बातें हैं, प्यारेलाल! नस्ल आगे बढ़ने से क्या होता है ? मेरी जानकारी में कई लोग जवानी में ही मर गए, कई पेट में ही मर गए, तो ये दुनिया रुक गई क्या ? इत्ते बड़े-बड़े डायनासोर मर गए तो क्या बिगड़ गया ? नस्ल तो ऊंट और चूहे की भी चल रही है, आपको उनसे कितने दिन काम पड़ता है ? कॉक्रोच की नस्ल से आपको कुछ फ़ायदा होता होगा, मुझे तो उनका न होना ही अच्छा लगता है। मुर्गी और अंडा नहीं होगा तो लोग कुछ और खा/पाल लेंगे। आपने देखा नहीं लोगों को, क्या-क्या खा जाते हैं!

और मेरे प्यारे, आखि़र में सबसे मज़ेदार और सबसे नई बात बताऊं, यह दुनिया किसीने बनाई नहीं है, यह अपनेआप बनी है ? अगर आपको लगता है कि यह किसी भगवान ने बनाई है तो साबित करके दिखाओ-

-संजय ग्रोवर

23-07-2017